
बीजापुर 12 फरवरी 2026। आर्थिक तंगी, अशिक्षा और सामाजिक पिछड़ेपन के बीच पला-बढ़ा राजेश आज आत्मनिर्भर जीवन की मिसाल बन चुका है। एक साधारण ग्रामीण परिवार में जन्मे राजेश (परिवर्तित नाम )के जीवन की शुरुआत संघर्षों से भरी रही। परिवार की आजीविका मुख्यतः कृषि मजदूरी पर निर्भर थी, जिससे बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति भी कठिनाई से हो पाती थी। वर्ष 2009 में पिता और वर्ष 2016 में माता के निधन ने उसकी पारिवारिक स्थिति को और अधिक दयनीय बना दिया।
युवावस्था के दौरान क्षेत्र में सक्रिय नक्सली गतिविधियों, स्थानीय दबाव, गलत संगत और आर्थिक मजबूरियों के कारण राजेश वर्ष 2023 में नक्सली संगठन के संपर्क में आया। धीरे-धीरे वह संगठन की विचारधारा से प्रभावित होकर अवैध और हिंसात्मक गतिविधियों में शामिल हो गया। इस दौर में उसका जीवन भय, असुरक्षा और अनिश्चित भविष्य से घिर गया, जिससे उसका सामाजिक और पारिवारिक जीवन पूरी तरह प्रभावित हुआ।
समय के साथ राजेश को यह एहसास हुआ कि नक्सली जीवन न तो सुरक्षित है और न ही उसमें कोई सकारात्मक भविष्य है। शासन की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति से प्रेरित होकर तथा अपने परिवार को सुरक्षित भविष्य देने की भावना से उसने मार्च 2025 में स्वेच्छा से आत्मसमर्पण कर दिया।
आत्मसमर्पण के पश्चात शासन द्वारा निर्धारित पुनर्वास प्रक्रिया के अंतर्गत उसे बीजापुर स्थित पुनर्वास केंद्र में आवश्यक परामर्श, सहयोग और कौशल उन्नयन के अवसर प्रदान किए गए। इसी क्रम में राजेश को राजमिस्त्री (मेसन) का प्रशिक्षण दिया गया, जिससे उसने निर्माण कार्य से संबंधित तकनीकी दक्षता हासिल की।
प्रशिक्षण पूर्ण होने के बाद राजेश वर्तमान में तेलंगाना राज्य के मुलुगु जिले में निर्माण श्रमिक (मेसन) के रूप में कार्यरत है और प्रतिदिन ₹600 की मजदूरी अर्जित कर रहा है। अपने श्रम और लगन के बल पर वह आत्मनिर्भर जीवन जी रहा है तथा समाज की मुख्यधारा से सफलतापूर्वक जुड़ चुका है।
राजेश की यह कहानी इस बात का सशक्त उदाहरण है कि यदि भटके हुए युवाओं को समय पर सही मार्गदर्शन, कौशल प्रशिक्षण और पुनर्वास सहायता मिले, तो वे हिंसा का मार्ग त्यागकर सम्मानजनक और शांतिपूर्ण जीवन अपना सकते हैं। यह प्रकरण शासन की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति की प्रभावशीलता को भी स्पष्ट रूप से दर्शाता है और अन्य युवाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत है।

