दुड़ेपाली की अद्भुत शिव प्रतिमाएं अब भी पूजा की बाट जोह रहीं

बीजापुर । जिले के घने वनों के बीच, जहां कभी “लाल आतंक” की गूंज ने जीवन की रफ्तार थाम दी थी, वहीं इतिहास की एक अनमोल धरोहर आज भी खामोशी में सांस ले रही है। कुटरु उपतहसील से लगभग 40 किलोमीटर दूर, केरपे पंचायत के अंतर्गत आने वाला दुड़ेपाली गांव जो इंद्रावती नेशनल पार्क का प्रवेश द्वार माना जाता है अपने भीतर सदियों पुरानी आस्था और कला का अद्भुत संगम समेटे हुए है।

तालाब किनारे विराजमान दुर्लभ और अलौकिक प्रतिमाएं मानो समय के प्रवाह को थामे खड़ी हैं। यहां नंदी, शिवलिंग, उमाशंकर, गणेश, नाग, पार्वती और हनुमान की प्रतिमाएं मौजूद हैं। इनमें सबसे आकर्षक और विशाल प्रतिमा भगवान हनुमान की है, जो लगभग 8 फीट लंबी है और भूमि पर शयन मुद्रा में स्थापित है। इतनी विशाल और सुंदर नक्काशी वाली प्रतिमाएं इस क्षेत्र में विरल ही देखने को मिलती हैं।
इतिहास के जानकार मनकू कोवासी जोकि नवीन महाविद्यालय कुटरु में इतिहास के प्रोफेसर एवं जिला पुरातत्व से जुड़ा हैं नें के बताये अनुसार, ये सभी प्रतिमाएं छिंदक नागवंशी काल की हैं, जिनका शासन 10वीं से 14वीं शताब्दी तक रहा। यह राजवंश शैव और वैष्णव मत का अनुयायी था। उस काल में बस्तर अंचल कला, स्थापत्य और धार्मिक आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र था। बीजापुर जिले के अनेक गांवों में आज भी शैव और वैष्णव संप्रदाय से जुड़ी हजारों प्रतिमाएं और मंदिर बिखरे पड़े हैं, लेकिन अधिकांश खंडित या जर्जर अवस्था में हैं। दुड़ेपाली की प्रतिमाएं अपने मूल स्वरूप और उत्कृष्ट शिल्प के कारण विशेष महत्व रखती हैं।
विडंबना यह है कि दो दशकों तक नक्सल प्रभाव की छाया में रहने के कारण यहां कभी नियमित पूजा-अर्चना नहीं हो सकी। इस वर्ष भी ये प्रतिमाएं वीरान पड़ी हैं। जहां कभी घंटियों की ध्वनि गूंजनी चाहिए थी, वहां आज जंगल की सरसराहट सुनाई देती है।
श्री कोवासी का कहना है अगर जिला प्रशासन एवं पुरातत्व विभाग इस स्थल पर ध्यान दे, तो यह स्थान न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र बन सकता है, बल्कि पर्यटन और शोध के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। यह स्थल बस्तर की समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रमाण है, जिसे संरक्षण और सम्मान की आवश्यकता है। दुड़ेपाली की ये प्रतिमाएं केवल पत्थर की मूर्तियां नहीं, बल्कि इतिहास के वे मौन अध्याय हैं जो पुनः पढ़े जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं—ताकि जंगल की खामोशी एक दिन फिर आस्था की आवाज़ से गूंज उठे।

