ढोल–मांदर की थाप, पारंपरिक रीति-रिवाज और देवी-देवताओं के आगमन से जीवंत हुई नवरात्र की विदाई

बीजापुर। बस्तर अंचल में नवरात्र केवल मां दुर्गा की आराधना का पर्व नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, लोक परंपराओं और पीढ़ियों से चली आ रही आस्था का जीवंत उत्सव भी है। नवरात्र के समापन पर मां दुर्गा की प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ पूरा माहौल भक्तिमय हो उठा। कहीं ढोल-मांदर की गूंज सुनाई दी, तो कहीं पारंपरिक वेशभूषा में श्रद्धालु नाचते-गाते मां को विदाई देते नजर आए। इस दौरान बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और जनजातीय परंपराओं की अनूठी झलक देखने को मिली।

बस्तर की धार्मिक परंपराओं में देवी-देवताओं का आगमन विशेष महत्व रखता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, पर्व के दौरान देवी-देवताओं का आह्वान, पारंपरिक पूजा-अर्चना और देव परंपरा से जुड़े अनुष्ठान श्रद्धालुओं के लिए गहरी आस्था का केंद्र होते हैं। कई स्थानों पर पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच देवी-देवताओं के आगमन और उनसे जुड़ी रस्मों का निर्वहन किया जाता है। यह परंपराएं आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत और प्रकृति के साथ उसके गहरे संबंध को दर्शाती हैं।
ढोल-मांदर की थाप पर दिखी लोक संस्कृति की झलक
विसर्जन के दौरान उत्साह और भक्ति का अनूठा संगम देखने को मिला। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप, जयकारों और सामूहिक सहभागिता ने उत्सव को खास बना दिया। बस्तर की लोक संस्कृति में सामूहिक नृत्य, पारंपरिक संगीत और धार्मिक अनुष्ठानों का अपना विशिष्ट स्थान है। नवरात्र की विदाई के अवसर पर यही रंग उत्सव की खूबसूरती को और बढ़ाते नजर आए।
विदाई में भी आस्था, अगले वर्ष फिर आने की कामना
मां दुर्गा की प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ श्रद्धालुओं ने नम आंखों और भक्तिभाव से मां को विदाई दी। श्रद्धालुओं ने सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना करते हुए अगले वर्ष फिर मां के आगमन की प्रार्थना की। विसर्जन का यह दृश्य संदेश दे गया कि आस्था केवल पूजा-पंडालों तक सीमित नहीं, बल्कि लोकजीवन, परंपराओं और सामुदायिक एकजुटता में भी रची-बसी है।
बस्तर में नवरात्र की यह विदाई धर्म, संस्कृति और परंपरा के उस संगम को सामने लाती है, जहां मां दुर्गा की आराधना के साथ आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत भी पूरी गरिमा के साथ दिखाई देती है।
