
बीजापुर। जिले के सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की बदहाल स्थिति एक बार फिर उजागर हुई है। 15 वर्षीय हमदान सोनवानी, जिसका हाथ खेलते समय गिरने से फ्रैक्चर हो गया था, पिछले दो दिनों से जिला अस्पताल के चक्कर काटता रहा, लेकिन उसे न समय पर डॉक्टर मिला और न ही प्राथमिक उपचार।

परिजनों के अनुसार, असहनीय पीड़ा से तड़पते हुए हमदान अपने दोस्तों के साथ जिला अस्पताल पहुंचा। पर्ची कटाने के बाद जब वह ऑर्थोपेडिक ओपीडी पहुंचा तो वहां डॉक्टर मौजूद नहीं थे। कर्मचारियों ने उसे आपातकालीन कक्ष में भेज दिया, जहां करीब दो घंटे इंतजार के बाद भी कोई डॉक्टर नहीं आया। दर्द से कराहते बच्चे को बिना इलाज के ही घर लौटना पड़ा।
दूसरे दिन भी हालात जस के तस रहे। आरोप है कि अस्पताल में न तो डॉक्टर उपलब्ध थे और न ही दर्द निवारक दवाएं। अंततः परिजनों को मजबूरन निजी अस्पताल का रुख करना पड़ा।
सिटी स्कैन, सोनोग्राफी और एक्स-रे भी किस्मत के भरोसे
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिला अस्पताल में सिटी स्कैन, सोनोग्राफी और एक्स-रे जैसी जरूरी जांचें नियमित रूप से उपलब्ध नहीं हैं। यदि किसी मरीज की जांच हो जाए तो उसे किस्मत का धनी माना जाता है। अन्यथा मरीजों को निजी अस्पतालों में महंगा इलाज कराने के लिए विवश होना पड़ता है।
सीएमओ और सिविल सर्जन को मरीजों की परवाह नहीं
जिले के स्वास्थ्य विभाग पर गंभीर आरोप लग रहे हैं। लोगों का कहना है कि सिविल सर्जन और सीएमओ केवल आश्वासन देते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई सुधार नहीं दिखता। बॉन्ड पर नियुक्त जूनियर डॉक्टरों के भरोसे इलाज की जिम्मेदारी छोड़ दी जाती है। जटिल मामलों में न तो वरिष्ठ डॉक्टर मौजूद रहते हैं और न ही ऑनलाइन परामर्श की प्रभावी व्यवस्था है।
व्यापारी संघ और आदिवासी समाज ने दी थी चेतावनी
बताया जा रहा है कि बीजापुर व्यापारी संघ और आदिवासी समाज ने पूर्व में भी स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्दशा पर नाराजगी जताते हुए सुधार की मांग की थी। चेतावनी के बावजूद विभाग द्वारा ठोस कदम नहीं उठाए गए।
आखिर कब सुधरेगी जिला अस्पताल की व्यवस्था?
क्यों मरीजों को समय पर इलाज और बुनियादी दवाएं तक उपलब्ध नहीं हो पा रहीं?
